Saturday, September 15, 2012

यादें


बादलों के पंख लें, काश उड़कर पा जाएं

ज़िन्दगी की धूप में मिले जो बचपन के साए

वो माँ की झिडकी से रूठकर जाना
वो नन्ही सी खिड़की पे मचलकर  बैठना
वो माँ का मनाना और फिर प्यार से खिलाना
इठला के फिर माँ के आँचल की छाया में ढकना
बीते पलों की तस्वीरों से चलो धूल हटायें

काश  नैनों ने जो ख्वाब देखे फिर सच हो जाएं
जो ज़िन्दगी की धूप  में मिल जाये बचपन के साए


वो सर्दी की दोपहर में धूप को तकना
वो मुंदी सी आँखों में सपने सजाना
रिमझिम से सावन का यूँ इंतज़ार करना
सावन के झूलों में मुंदी आँखों से झूलना
छोटी सी हथेलियों पे मेहंदी सजाना
दिन भर की भागा दौड़ी से जो कभी थकान  भी आए
तो चाय की चुस्की से दूर हो जाये
इस फेरारी सी ज़िन्दगी में  यूँ तन्हा कैसे रह पायें
ज़िन्दगी के सुनहरे पल चलो फिर से बिताये
समय की छुक छुक को चलो उल्टा घुमाए
बचपन के स्टेशन पे थोडा घूमकर आ जाएं

पल की खुट्टी और पल की मिट्ठी तो शक्कर से भी ज्यादा मीठी हो जाये
आज के रिश्तों में पड़ी दरार क्यूँ नीम से भी कडवी हो जाये

छुट्टी की घंटी से जो मुस्कान होठों प  जाए
वो सुकून लाखों खर्चों से कोई खरीद न पाए



 

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