Tuesday, September 25, 2012

स्वप्न


लाल सुनहरे से रंग बिरंगी
ह्रदय में पुरजोर जगी
ख्वाहिशों  के पंख सतरंगी
मुंदे से नैनों में कब हौले से आये
ढीठ बने हैं डेरा जमाये
ज्ञात नहीं किस तिथि को जाएँ
नैनों के अतिथी कहलाये
चक्षु तरंगिनी में पार लगें
तो कभी भय हैं कहीं कतर न जाएँ
ख्वाहिशों के पंख सतरंगी

कब हार मिले कब जीत मिले
इन पर कब होता कोई असर
जो बीत गया बिसरा दिया
अब आगे की सुध ज्ञात रहे
सब हार गए पर ध्यान रहे
हृदय में बस ये ही बात  रहे
श्रम साहस की डोर को थामे
सच की तपती धूप में देखो

श्रम साहस ही हैं सच्चे संगी
ख्वाहिशों के पंख सतरंगी

मानव के विश्वास को हैं बल देती
शक्ति को यूँ ही क्षीण कहाँ  होने देती
सब  लुट भी जाये पर कोई छीन न पाए
हों जाएँ बैरी जो हों यें अधूरी
हो जाएँ सगी जो हों यें पूरी
करती कहाँ ये भेद मनुष्य में
सबको गले लगाती
जिद पे अड़ी हैं थोड़ी हठी हैं
ह्रदय में फिर पुरजोर जगीं हैं
ख्वाहिशों के पंख सतरंगी



धडकनें नवीन सी जग जाएँ
फिर से बह चले ज़िन्दगी
बिन डोर के बह जाएँ
नैनों में थम जाएँ वहीँ

अंत नहीं है इनका कोई
आदि कहाँ था स्मरण नहीं
कभी डूबती कभी तैरती इन ख्वाहिशों के कभी
लग जाते है तो कभी कतर जाते है पर







 

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