Friday, January 22, 2010
चेहरा
इस भीड़ में गुम दिखाई देता है एक चेहरा
भीड़ में गुम कई चेहरे किसी अमीर का चेहरा तो किसी गरीब का चेहरा
बर्फीली सर्दी में ठिठुरता हुआ एक असहाय का चेहरा
बसेरे की चाह में एक लाचार का चेहरा
रोज़ी की तलाश में रिकशा खीचते एक गरीब का चेहरा
अशान्त मन से भी झूठी हंसी का आवरण ओढे॰ एक अमीर का चेहरा
इन विभिन्न चेहरों से भिन्न एक चेहरा
अपने ही चेहरे की पहचान में लीन एक चेहरा
प्रचंड धुंध में भी राह तलाशता एक चेहरा
अपने क्षींण होते विश्वास को बल देता एक चेहरा
अपने अस्तित्व को सहेजता एक चेहरा
पथरीली राहों में गिरकर फिर संभलता हुआ चेहरा
न तो किसी अमीर का न ही किसी गरीब का
भीड़ के बीच में भी भीड़ से अलग एक चेहरा
Thursday, January 14, 2010
अम्मा
साँसों में जों घुटता था कोई खुल के साँसें कहीं लेता तो होगा न
कष्टों में जों घिरा था कोई अब सुख की छाँव तो सोता होगा न
उन निरीह आँखों में जों सपने थे अब पूर्ण कोई तो करता होगा न
मन की बातें जों समझ न पाए बिन बोले कोई समझता तो होगा न
अंत यहाँ पे हुआ था जिनका आदि कहीं तो होगा न
मरण उपरांत जीवन है ,का कहीं सत्य उजागर तो होगा न
उसी सत्य स्वरुप को दर्शाने फिर इस धरा पर आओ न
फिर पुष्प बनकर तुम बगिया में वही सुगंध बिखराओ न
या धरती पर किरणें बनकर तुम उजियारा फैलाओ न
चमकती धूप की किरणों सा तुम अपना आँचल फैलाओ न
आँचल में छिपकर सो जाएँ ऐसा कोई गीत तो गाओ न
वस्त्रों में समाहित सुगंध सी उन्मुक्त पवन बन जाओ न
यथार्थ में न भी आओ तो स्वप्न में ही आ जाओ न
सुधा सरल सी नन्ही मोहिनी मूरत ही दिखला जाओ न
कष्टों में जों घिरा था कोई अब सुख की छाँव तो सोता होगा न
उन निरीह आँखों में जों सपने थे अब पूर्ण कोई तो करता होगा न
मन की बातें जों समझ न पाए बिन बोले कोई समझता तो होगा न
अंत यहाँ पे हुआ था जिनका आदि कहीं तो होगा न
मरण उपरांत जीवन है ,का कहीं सत्य उजागर तो होगा न
उसी सत्य स्वरुप को दर्शाने फिर इस धरा पर आओ न
फिर पुष्प बनकर तुम बगिया में वही सुगंध बिखराओ न
या धरती पर किरणें बनकर तुम उजियारा फैलाओ न
चमकती धूप की किरणों सा तुम अपना आँचल फैलाओ न
आँचल में छिपकर सो जाएँ ऐसा कोई गीत तो गाओ न
वस्त्रों में समाहित सुगंध सी उन्मुक्त पवन बन जाओ न
यथार्थ में न भी आओ तो स्वप्न में ही आ जाओ न
सुधा सरल सी नन्ही मोहिनी मूरत ही दिखला जाओ न
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